प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो, दयानिधे विश्वकर्मा घर आवो। मेरी बिगड़ी बना दो हे स्वामी, सब जग तेरी माया॥ तुम हो शिल्पी विश्व निर्माता, जग के रचयिता तुम ही हो। देव दानव सब शीश नवाते, तीनों लोक के दाता॥ रथ, यंत्र, अस्त्र, शस्त्र बनाए, इंद्रलोक तुमने रचाया। स्वर्ग, पाताल, धरा तुम ही ने, अद्भुत रूप बनाया॥ विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे। मन इच्छित फल पावे नर, सुख-संपत्ति घर आवे॥ प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो, दयानिधे विश्वकर्मा घर आवो॥
॥ इति ॥
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