आरती कीजै श्री रामलला की। पुष्ट पुनीत छबीली छला की॥ ब्रह्म जो व्यापक जगत पसारा। सो अवतरेउ पिता हित प्यारा॥ राम जनम अवधपुरी छाई। प्रगटे दीन दयाल गोसाईं॥ चारि भ्रात एक ते एक बड़ेरे। रामचन्द्र सब ही तें प्यारे॥ घुटरुन चलत जनक मन भावन। धूरि धूसरित सुन्दर सांवन॥ नीलकंज तनु सरसिज लोचन। स्यामल गात कोटि रति मोचन॥ छबि लखि मातु कौशल्या फूली। मन्दिर बीच फिरति है भूली॥ धन्य कौशल्या धन्य दशरथ। धन्य अवध जहँ रघुकुल के रथ॥ सीय सहित प्रभु सरयू तीरा। करत विहार परम रुचिरा॥ तुलसीदास प्रभु आरती गावे। राम कृपा तेहि अनुदिन पावे॥
॥ इति ॥
दीप जलाने के लिए स्पर्श करें



